संत तुकाराम जयंती : जिन्होंने भक्ति को नया रुप दिया

संत तुकाराम भक्त और एक महान संत थे. भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में डूबे हुए संत तुकाराम जी का जन्म एक ऎसी घटना थी जिसने भक्ति की धारा को एक नया रंग दिया. ये एक महान संत कवि थे जो भारत में लंबे समय तक चले भक्ति आंदोलन के एक अग्रदूत संत भी थे. इस लिए इन्हें संत तुकाराम के नाम से पुकारा जाता रहा है. संत तुकाराम जी ने अपनी साधना और भक्ति द्वारा चारों ओर जो अलख जगाई वह आज भी लोगों के भीतर मौजूद है. अपने समय की अवस्था का इनकी वाणी में दर्शन दिखाई देता है. तुकाराम जी की वाणी में जो गहराई और श्रद्धा दिखाई देती है, वह अत्यंत ही आश्चर्य से भर देने वाली है. तुकाराम की वाणी सूत्रबद्ध, अल्पाक्षर, रमणीय तथा मर्मभेदक रही है. फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी के दिन उन्होंने अपनी देह त्यागी. संत कवियों के सहित्य में जो आध्यात्म सूत्र पिरोया हुआ है और जो विचारों का कलेवर दिखाई पड़ता है, वह सभी कुछ तुकाराम जी में दिखाई देता है.

तुकाराम जीवन काल

संत तुकाराम का जन्म पुणे में हुआ था. पुणे में स्थित देहू नामक गांव में हुआ था. संत तुकाराम के जन्म समय को लेकर विद्वानों में एकमत दिखाई नहीं देता है. ऎसे में इनकी जन्म तिथि को लेकर मतभेद दिखाई देते हैं. संत तुकाराम जी जिस कुल में जन्में थे उस कुल के लोग पंढरपुर पर बहुत विश्वास रखते थे. पंढरपुर की यात्रा पर इन लोगों का बहुत योगदान रहता था. धार्मिक जीवन इन्हें हर जगह प्राप्त होता है. देहू गांव में इनके परिवार को एक अच्छा स्थान प्राप्त था. इनका परिवार महाजन होने के कारण प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित परिवार था. एक भरा पूरा कुटूंब इन्हें मिलता है. तुकाराम जी की माता का नाम कनकाई जी था और इनके पिता का नाम बहेला था. अपने बचपन में तुकाराम जी को अपने माता-पिता का बहुत स्नेह प्राप्त होता है. परिवार में जो धार्मिक माहौल इन्होंने देखा उसका इनके जीवन पर भी बहुत असर दिखाई देता है. तुकाराम जी की किशोरावस्था में ही अपने माता-पिता का विच्छोह सहना पड़ा था. इनके माता-पिता का स्वर्गवास होने का बाद जीवन में बहुत बदलाव आया. इसके बाद उसी समय के आस-पास जब एक अकाल का असर संपूर्ण क्षेत्र पर पड़ा तो उसका असर इनके परिवार पर भी पड़ा. भीषण अकाल के कारण इनकी जीवन संगनी ओर इनके पुत्र की मृत्यु हो जाती है. पत्नी व बालक की भूख के कारण मृत्यु होने से इनके मन को गहर आघात लगा. विपत्तियों का उन पर पहाड़ ही टूट पड़ा था. इनकी दूसरी पत्नी का स्वभाव भी बहुत कठोर था. संत तुकाराम उस समय में बहुत बड़े जमीदार थे. इस कारण जीवन में बहुत सारा झूठ और अलगाव के चलते इनका मन बहुत ही परेशान रहने लगा था. तुकाराम की प्रवृत्ति इन सभी प्रपंच से ऊब चुकी थी. इनकी दूसरी पत्नी "जीजा बाई" बहुत ही कठोर वाणी की थीं. तुकाराम जी को अब किसी भी प्रकार का मोह नहीं था. अपने आस पास के माहौल से तंग आ चुके थे. अब वह भगवान की भक्ति में खुद को लीन कर देना चाहते थे. सांसारिक सुखों से विरक्ति पाने के लिए तुकाराम जी अपने गांव के समीप भावनाथ नामक पहाड़ी पर जाने लगे. वहीं भगवान की भक्ति करने में लग जाते हैं. भगवान्‌ विट्ठल के नाम स्मरण में अपने दिन बिताने लगते हैं.

संत तुकाराम जी का भक्ति में प्रवेश

संत तुकाराम जी को उनकी भक्ति का मार्ग उनके गुरु की कृपा से भी प्राप्त होता है. लोभ और द्वेष से मुक्त होते हुए, परमेश्वर प्राप्ति के लिये ललायित हुए तुकाराम जी को बाबा जी चैतन्य नामक साधु जी का दर्शन प्राप्त होता है. गुरु द्वारा 'रामकृष्ण हरि' मंत्र की प्राप्ति होती है. इस घटना के बाद इनके जीवन में जो बदलाव आया वह सभी कुछ इनके चारों ओर होने वाले बदलाव को दर्शाता है. कहा जाता है की गुरु का संदेश इन्हें स्वप्न में प्राप्त होता है. जिसके बाद ये भक्ति की पूर्णता को प्राप्त कर पाते हैं. गुरु के उपदेश प्राप्त होते ही इन्होंने अपने जीवन का सभी कुछ भक्ति में लगा दिया. जीवन के लगभग संपूर्ण वर्ष लोगों को भक्ति का उपदेश देने में बिताए. तुकाराम जी का स्वभाव इतना शुद्ध व वैराग्य से भरपूर था की इन्हें किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं था. ये हर किसी को क्षमा कर देने का गुण रखते थे. इसी कारण कहा जाता है कि इनकी निंदा करने वाले भी उनके प्रति श्रद्धा भाव रखते थे. निंदा करने वाले भी इनसे क्षमा मांग लेते थे. इनकी बुराई करने वाले भी इनके भक्त बन गए थे. भक्ति में भगवत कथा का प्रचार करते हुए आगे बढ़ते थे. धर्म का सबको उपदेश करते व परमार्थ मार्ग को आलोकित करते थे. अधर्म का खंडन करते हुए तुकाराम जी ने अपना सारा जीवन व्यतीत किया.

तुकाराम जी द्वारा रचित रचनाएं

संत तुका राम जी ने अनेक भक्ति रचनाएं निर्मित की थी. तुकाराम जी ने जो भी गाया वह उनके मन की अभिव्यक्ति थी. मन की अभिव्यक्ति 'अभंग' वाणी के रुप में सभी के सामने आती है. अभंग का अर्थ होता है वह गीत जो भगवान विट्ठल या विठोबा की स्तुति में छंद रुप में गये गए. महाराष्ट्र के संतों ने समाज को जागृत करने के लिए जो छंद क्षेत्रीय भाषा में गाये, उन्हें ही अभंग के नाम से जाना गया है. अभंग के अतिरिक्त इनकी अन्य कोई विशेष साहित्यिक कृति का पता नहीं चल पाता है. इनके द्वारा गाए गए भक्ति गीतों को इनके शिष्यों ने ही आगे बढ़ाया और उन्हें लिखा. माना जाता है कि संत ज्ञानेश्वर और श्री एकनाथ द्वारा जो रचनाएं रचि गयी थी उनका प्रभाव संत तुकाराम जी की भाषा में बहुत अधिक दिखाई दिया. ज्ञानेश्रवरी रचना और एकनाथी भागवत ग्रंथों की छाप इनके विचारों पर स्पष्ट रुप से दिखाई देती है.

संत तुकाराम जी के विचार

संत तुकाराम जी ने अपनी भक्ति वाणी द्वारा लोगों के जीवन की निराशा और अधंकार को दूर करने की बहुत कोशिश की. वह हमेशा इस बात पर अधिक जोर देते थे कि सभी लोग उस एक ईश्वर की संताने हैं. इस कारण सभी समान है. किसी में कोई भेद भाव नही हो सकता है. उन्होंने धर्म के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. संत तुकाराम जी को महाराष्ट्र धर्म का प्रचारक माना गया है. इनके सिद्धांतों के द्वारा भक्ति आंदोलन को एक तीव्रता प्राप्त हुई. तुकाराम जी का तत्कालीन सामाजिक विचारधारा पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है. जाति और वर्णव्यवस्था पर कुठाराघात करते हैं. समानता के सिद्धांत के द्वारा वर्णव्यवस्था को लचीला बनाने में इनका योगदान सदैव ही यादगार रहेगा.