महेश्वर व्रत 2022 : जानें क्यों किया जाता है महेश्वर व्रत

फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को महेश्वर व्रत करने का विधान है. इस वर्ष महेश्वर व्रत 17 मार्च 2022 को बृहस्पतिवार के दिन किया जाएगा. महेश्वर भगवान शिव का ही एक अन्य नाम है. इस दिन भगवान शिव का पूजन करना अत्यंत शुभ एवं फलदायी माना गया है. फाल्गुन माह में भगवान शिव के पूजन की विशेष महिम का वर्णन हमे पुराणों में प्राप्त होता है. इस माह में आने वाले प्रमुख पर्वों में से एक पर्व महेश्वर व्रत का भी है. इस दिन व्रत का धारण करने का नियम भी होता है.

फाल्गुन मास की चतुर्दशी तिथि के दिन स्नान आदि करने के उपरांत पूजा आरंभ होती है. शिव जी की प्रतिमा को स्नान कराकर पुष्प, अक्षत, रोली, धूप, दीप, बेल पतों को अर्पित करते हुए पूजा करनी चाहिए. महेश्वर व्रत पूजा के दिन में श्रद्धालु भक्त पवित्र नदियों में स्नान करते हैं. स्नान के पश्चात सुर्य को अर्घ्य देने के बाद दीप प्रज्वलित किया जाता है. महेश्वर व्रत पूजा में स्नान, दान, होम और उपासना आदि का अनन्त फल प्राप्त होता है. इसलिए इसमें दान करने से अनेक यज्ञों के समान फल मिलता है.

महेश्वर व्रत फल

जो स्त्री-पुरुष इस व्रत को पूरे विधि विधान से करते हैं, उन्हें शिवलोक प्राप्त होता है. इसके बाद अच्छे कुल में मनुष्य रूप में जन्म लेता है. इस व्रत का पालन करने पर स्त्रियों को सौभाग्य की प्राप्ति होती है. जीवन साथी का सुख प्राप्त होता है और दांपत्य जीवन के सुख में वृद्धि होती है.

महेश्वर व्रत के संदर्भ में अनेक कथाएं प्रचलित हैं. जिनमें से से कुछ के अनुसार भगवान शिव बिना किसी निवास स्थान के रहते हैं. पर पार्वती के साथ विवाह उपरांत वह गृहस्थ जीवन में आते हैं. उन्हें निवास स्थान चुनना पड़ता है. इस प्रकार एक वैरागी से गृहस्थ जीवन की ओर प्रवेश का स्वरुप ही इस व्रत की कथा को दर्शाता है.

भगवान शिव के महेश्वर स्वरुप का व्रत एवं पूजन 12 वर्षों तक करने तक व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है. महेश्वर व्रत का आधार त्रयोदशी की रात्रि से आरंभ हो जाता है. इस दिन से ही शुद्धता एवं ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए. सृष्टि के कण-कण में विराजमान भगवान महेश्वर का अशीर्वाद पाना अत्यंत ही सुलभ एवं सहज कार्य होता है. भगवान शिव का महेश्वर रूप भक्तों का कल्याण करता है.

महेश्वर व्रत पूजा

भगवान महेश्वर को शिवलिंग रुप में या प्रतिमा रुप में जैसे भी चाहें पूजन किया जा सकता है. विशेष रुप से शिवलिंग रुप में पूजन करने समस्त कामनाओं की पूर्ति कराती है. शिव का साक्षात स्वरुप शिवलिंग में विराजमान माना गया है. भगवान महेश्वर के पूजन में रुद्राभिषेक को अत्यंत ही विशेष पूजन माना गया है. भगवान शिव पर किया गया जलाभिषेक शिव को अत्यंत प्रिय होता है.

भगवान शिव पर जल का अभिषेक करने के लिए शुद्ध जल में गंगा जल मिला कर करने से अत्यंत शुभदायक माना गया है. सभी परेशानियों में शिव अभिषेक करना अत्यंत ही चमत्कारिक उपाय माना गया है. महेश्वर के अभिषेक की विधि प्राचीन काल से ही चली आ रही है. पुराणों में इस विधि का विस्तार पूर्वक उल्लेख भी किया गया. भगवान महेश्वर के अभिषेक में अनेक वस्तुओं का उपयोग किया जाता है जो अलग अलग रुप में अपना फल देने के लिए अत्यंत महत्वपुर्ण मानी गई हैं.

भगवान शिव का अभिषेक करते समय शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करना चाहिए. भगवान शिव को बेल पतों को अर्पित करना सभी पापों का नाश करने वाला होता है.

महेश्वर व्रत पर करें शिव मंत्रों का जाप

महेश्वर व्रत के दिन भगवान शिव के मंत्रों का जाप अवश्य करना चाहिए. महेश्वर मंत्र भगवान शंकर को प्रसन्न करने का अत्यंत सरल और अचूक मंत्र है. इस मंत्र का रुद्राक्ष की माला से जाप करना उत्तम होता है. उत्तर दिशा की ओर मुख करके ही मंत्र का जाप करना चाहिए. जाप करने से पहले शिवलिंग पर बेल-पत्र अर्पित करना चाहिए. शिवलिंग पर जलाभिषेक करना चाहिए. यह महेश्वर मंत्र अमोघ एवं मोक्षदायी होता है. महेश्वर व्रत के दिन भक्त पर कठिन व्याधि या समस्या आन पड़े तब श्रद्धापूर्वक इस मंत्र का जप करना चाहिए. यह बड़ी से बड़ी समस्या और विघ्न को टाल देता है.

मंत्र:

"ओम तत्पुरुषाय विदमहे, महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।"

"ॐ नमः शिवाय शुभं शुभं कुरू कुरू शिवाय नमः ॐ"

वृषभ दान महत्व

महेश्वर व्रत के दौरान वृषभ दान को एक अत्यंत ही प्रभावशाली और महत्वपूर्ण दान माना गया है. वृषभ-दान पवित्र और दानों में सबसे उत्तम दान बताया गया है. इस दिन एक स्वस्थ और पुष्ट वृषभ(बैल) के दान का फल, दस गायों के दान से भी अधिक माना गया है. शुभ लक्षण सम्पन्न वृषभ को दान करने से दान देने वाले व्यक्ति के कुल का उद्धार होता है. वृषभदान के महत्व का वर्णन भविष्यपुराण में भी किया गया है. वृषभ दान के दिन वृषभ की पूंछ में चांदी लगाकर. उसे सुंदर तरीके से सजाकर. आभुषणों से अलंकृत करना चाहिए. उसके पश्चात शुद्ध प्रसन्नचित मन से किसी योग्य ब्राह्मण को दक्षिणा के साथ उस वृषभ का दान करना चाहिए. ब्राह्मणों को दान करने के उपरांत प्रार्थना करनी चाहिए कि उसके सभी पापों का नाश हो सके. इस प्रकार उत्तम रुप से वृषभ का दान करने वाले व्यक्ति के किए गए पापों का प्राश्चित होता है और शुभ कर्मों में वृद्धि होती है.

महेश्वर व्रत का पौराणिक महत्व

भगवन शिव और माता पार्वती की अर्चना कर दीपदान करने से पुनर्जन्मदि का कष्ट नहीं होता है. इस दिन भगवान शिव का दर्शन किया जाए तो अनेक जन्मों तक व्यक्ति वेद-ज्ञानी और धनवान होता है. लिंग पुराण व ब्रह्मपुराण के अनुसार इस दिन वृषदान करने से शिवपद की प्राप्ति संभव होती है. इसके अलावा जो भी सामर्थ्य अनुरुप दान किया जाए तो संपति बढ़ती है. मान्यताओं के अनुसार इस पुण्य तिथि को भगवान शंकर ने राक्षस का संहार करके भक्तों क अकल्याण भी किया था. इस दिन संध्या समय मंदिरों में दीपक जलाए जाते हैं. शिव पूजन और शिव कथा कथा की परंपरा है. सांयकाल के समय देव मंदिरों, चौराहों, गलियों और बड़ के वृक्ष के पास दीपक जलाते हैं.

फाल्गुन माह के शुक्ल चतुर्दशी को उपवास तथा शिव पूजन करने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त होता है. विष्णुधर्मोत्तर ग्रंथ के अनुसार इस व्रत का फल अत्यंत ही शुभदायी होता है. इस व्रत को करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं. मोक्ष प्राप्ति का एक उत्तम मार्ग बनता है ये व्रत. “ राज सुख देता है”.