कार्तिक संक्रान्ति 2022 : जानें कब होगी और कैसे करें संक्रान्ति पूजा

कार्तिक संक्रान्ति हिन्दुओं के प्रमुख त्यौहारों मे से एक है. सूर्य जब तुला राशि में प्रवेश करते हैं, तो कार्तिक संक्रांति पर्व को मनाया जाता है. यह पर्व अक्टूबर माह के मध्य के समय पर आता है. कार्तिक संक्रान्ति का पर्व इस वर्ष 17 अक्टूबर 2022 को सोमवार के दिन मनाया जाएगा. इस संक्रांति में सूर्य प्रात:काल 19:22 पर तुला राशि में प्रवेश करेगा. 40 मुहूर्ति इस संक्रांति का पुण्य काल दोपहर से रहेगा.

कार्तिक संक्रांति पूजा

कार्तिक संक्रांति के दिन सभी को सूर्योदय से पूर्व उठ कर स्नान करना चाहिए. मान्यता अनुसार जो व्यक्ति कार्तिक संक्रांति के दिन स्नान नहीं करता है वह रोगी व आलसी बना रहता है. कार्तिक संक्रांति पर तिल-स्नान को अत्यंत पुण्यदायक माना गया है. तिल-स्नान करने से आरोग्य की प्राप्ति होती है. कार्तिक संक्रांति के दिन तीर्थ स्थलों, मन्दिर, एवं पवित्र नदियों में स्नान करने की परंपरा भी रही है.

कार्तिक सक्रांति के दिन सूर्यदेव की पूजा करनी चाहिए. मान्यता अनुसार सूर्यदेव का पूजन करने से व्यक्ति रूपवान होता है उसे किसी भी रोग का भय नहीं होता है. कार्तिक संक्रांति के दिन पितरों के लिए तर्पण करने का विधान भी है. इस दिन भगवान सूर्य को जल देने के पश्चात अपने पितरों का स्मरण करते हुए तिलयुक्त जल देने से पितर प्रसन्न होते हैं.

कार्तिक संक्रान्ति के अन्य रंग

कार्तिक संक्रान्ति के अवसर पर देश भर में बहुत से धार्मिक कार्य किए जाते हैं. इस दिन लोग उत्सव मनाते हैं. भारत के सभी प्रान्तों में अलग-अलग नाम व भांति-भांति के रीति-रिवाजों द्वारा इस पर्व को उत्साह के साथ मनाया जाता है. इस संक्रान्ति के दिन किसान अपनी अच्छी फसल के लिये भगवान को धन्यवाद देकर अपनी अनुकम्पा का आशीर्वाद पाते हैं. कार्तिक संक्रान्ति के त्यौहार को फसलों एवं किसानों के त्यौहार के साथ भी जोड़ा जाता है.

कार्तिक संक्रान्ति विभिन्न वर्गों के समुदाय का सबसे प्रमुख त्यैाहार भी होता है. इस दिन तीर्थस्थल में स्नान करके दान धर्म से जुड़े कामों को किया जाता है. पवित्र नदियों के संगम पर लाखों की संख्या में लोग इस पावन पर्व के दिन नहाने के लिये जाते हैं. धार्मिक एवं तीर्थस्थलों में मेलों का आयोजन होता है.

कार्तिक संक्रान्ति को उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक बहुत उल्लास के साथ मनाया जाता है. घरों में आंगन को सजाया जाता है. रंगोली इत्यादि बनाई जाती है. सम्पूर्ण भारत में मनाया जाने वाला संक्रान्ति पर्व विभिन्न रूपों में सभी को जोड़े हुए भी है. विभिन्न प्रान्तों में इस पर्व को मनाने के जितने अधिक रूप प्रचलित हैं उतने किसी अन्य में नहीं मिलते हैं.

कार्तिक संक्रान्ति - दीपदान का समय

कार्तिक संक्रान्ति के दीप दान करने का बहुत महत्व रहा है. पौराणिक ग्रंथों में कार्तिक संक्रांति में दीपदान मनोकामनाओं को पूरा करने वाला कार्य होता है. वैसे तो कार्तिक मास के पूरे मास के समय दीपदान करा जाता है. लेकिन संक्रान्ति के दिन विशेष होता है. धर्म शास्त्रों के अनुसार इस पूरे कार्तिक संक्रांति में व्रत व तप का विशेष महत्व बताया गया है इसके साथ ही दीप जलाने की परंपरा भी प्राचीन काल से चली आ रही है. जो व्यक्ति कार्तिक मास में दीपदान करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. संक्रांति के दिन नदी, पोखर, तालाब, घर आदि स्थानों पर दीप दान करना बताया शुभ होता है. दीप दान करने से पुण्यों की वृद्धि होती है.

कार्तिक संक्रांति - तुलसी पूजन

कार्तिक संक्रांति के दिन तुलसी पूजा का भी विशेष कार्य माना गया है. कार्तिक संक्रांति के दिन तुलसी पूजन करने से दांपत्य सुख मिलता है. व्यक्ति को अपने कार्यक्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है. संक्रांति के दिन तुलसी पूजा और तुलसी के सामने दीपक अवश्य जलाना चाहिए.
कार्तिक संक्रांति के दिन तुलसी पूजा करने से परिवार में सुख बना रहता है. संतान का सुख मिलता है. वंश की वृद्धि होती है. मांगलय सुखों की वृद्धि होती है. इस संक्रांति के दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है, पशुओं का पूजन होता है. मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है, जिसे सूर्य देव को नैवैद्य(भोग) के रुप में चढ़ाया जाता है और प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं.

कार्तिक संक्रांति दान-पुण्य का पर्व

शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक संक्रांति के दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक कार्य किए जाते हैं. ऐसी मान्यता है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर फिर से मिलता है. इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है. कार्तिक संक्रांति के दिन गंगा, यमुना जैसी पवित्र नदियों एवं संगम स्थल पर मेलों का आयोजन होता है. जिसे कार्तिक मेले के नाम से भी जाना जाता है. संक्रान्ति के दिन स्नान के बाद दान देने की भी परंपरा रही है.

इस दिन गंगा स्नान करके तिल के मिष्ठान आदि को ब्राह्मणों और अन्य लोगों को दान किया जाता है. इस पर्व पर क्षेत्र में गंगा के घाटों पर मेले लगते है. इस व्रत के दिन खिचड़ी बनाई जाती है खिचड़ी गरीबों में बांटने का भी अत्यधिक महत्व होता है. कार्तिक संक्रान्ति के दिन उड़द, चावल, तिल, गाय, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कम्बल आदि दान करने का भी महत्त्व है. इस दिन एक दूसरे को तिल और गुड़ भी दिया जाता है.

सूर्य का कन्या राशि से तुला राशि में होने का प्रभाव

कार्तिक संक्रान्ति में सूर्य की स्थिति का में बदलाव आता है. इस समय के दौरान सूर्य कन्या राशि से निकल कर तुला राशि में जाता है. सूर्य का कन्या राशि से तुला राशि में संक्रमण का समय ही संक्रांति का दिन कहलाता है. तुला राशि में सूर्य नीच का होता है. तुला राशि में सूर्य के नीच होने इसकी स्थिति शुभ नहीं मानी जाती है. यहां सूर्य कुछ कमजोर माने जाते हैं. इसी सम्य के बाद से मौसम में बहुत बदलाव भी दिखाई देता है.
कार्तिक संक्रांति के बास से मौसम में ठंडक बढ़ने लगती है और सूर्य की रोशनी पृथ्वी पर आने में भी धीमी होती है. सूर्य के तेज में बहुत अधिक कमी आने लगती है. इसलिए जिन लोगों का जन्म तुला राशि में हुआ है उन लोगों के लिए भी ये संक्रान्ति खास होती है. व्यक्ति को चाहिए कि इस दिन पूजा उपासना करे. मुख्य रुप से इस दिन सूर्य उपासना करनी चाहिए.