बृहस्पति ग्रह | Planet Jupiter | Jupiter Birth Story

बृहस्पति ग्रह को गुरू भी कहा जाता है बृहस्पति जी देवताओं के गुरु हैं, यह ज्ञान और शिक्षण का प्रतिनिधित्व करते हैं. इनके द्वारा व्यक्ति बौद्धिकता के उच्च स्तर को पाता है. बृहस्पति धनु और मीन राशि के स्वामी हैं इनके देवता इंद्र और ब्रह्मा जी हैं. धर्म शास्त्रों द्वारा बृहस्पति जी के महत्व को बहुत सुंदर रूप में वर्णित किया गया है. यह समस्त देवी-देवताओं के गुरु हैं जो सत्य एवं सदाचार का संदेश देते हैं. देव बृहस्पति बुद्धि और वाक शक्ति के स्वामी कहे गए हैं.

बृहस्पति का स्वरूप | Form of Jupiter

बृहस्पति पीले वस्त्रों को धारण किए हुए स्वर्ण के समान आभा देते प्रतीत होते हैं. इन्होंने मस्तक पर स्वर्णमुकुट तथा कंण्ठ में सुंदर माला को धारण किया हुआ है. यह कमल के आसन पर विराजमान हैं तथा अपने हाथों में दंड, रुद्राक्ष माला, पात्र को धारण किए हुए वरमुद्रा में होते हैं. इनका वाहन जो स्वर्णनिर्मित रथ है जिसपर पीले रंग के आठ घोड़े जुते रहते हैं

बृहस्पति अपने ज्ञान द्वारा देवताओं को उनका यज्ञ-भाग प्राप्त कराते हैं तथा उनके ज्ञान मार्ग बनते हैं तथा देवों की असुरों से रक्षा करते हैं. देव गुरू बृहस्पति जी ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या कि जिससे प्रसन्न हो भगवान शिव ने उन्हें देवगुरु का प्रदान किया. बृहस्पति जी पत्नियों के नाम शुभा, तारा ओर ममता हैं. बृहस्पति जी को देवमंत्री, देव पुरोहित, देवेज्य, इज्य, गुरु, सुराचार्य, जीव, अंगिरा और वाचस्पति इत्यादि नामों से भी जान जाता है. 

बृहस्पति की शांति के उपाय | Remedies to Calm Jupiter

बृहस्पति ग्रह की शांति के लिए अमावस्या तथा बृहस्पतिवार के दिन व्रत करना चाहिए. पीला पुखराज धारण करें.

बृहस्पति के लिए दान | Charity for Jupiter

बृह्स्पति के लिए दान में दी जाने वाली वस्तुओं में स्वर्ण, पीले वस्त्र, हल्दी, घृत, पुखराज, चना दाल, नमक, मधु और चीनी इत्यादि का दान देना उत्तम माना गया है.

बृहस्पति जन्म कथा | Birth story of Jupiter

बृहस्पति जी को महर्षि अंगिरा और सुनीमा का पुत्र कहा गया है. देव गुरू के जन्म के विषय में पौराणिक कथाओं में लिखा गया है. इन कथाओं के अनुसार, महर्षि अंगिरस ने एक बार घोर तप किया इनकी इस कारण इनकी तपस्या का तेज और प्रभाव अग्नि से भी अधिक तीव्र हो जाता है. उस दौरान अग्नि देव भी तपस्या में रत होते हैं और महर्षि का तेज देख कर अपने को हीन समझने लगते हैं तथा दुखी भाव से ऋषि अंगिरा के समक्ष जाते हैं.

अग्नि देव ऋषि से कहते हैं कि हे मुनिवर आप प्रथम अग्नि हो गए हैं व आपके तेज के समक्ष मुझे दूसरा स्थान प्राप्त हुआ है. इस कारण मेरे इस रूप में मुझे कोई अग्नि नहीं मानेगा और मेरा सम्मान समाप्त हो जाएगा. अग्नि की करूण वाणी सुन ऋषि उनसे कहते हैं कि हे देव आप इस प्रकार निराश न हों आपका जो स्थान रहा है वही हमेशा रहेगा आपके सम्मान में कोई कमी न आएगी अत: तब महर्षि अंगिरा ने अग्नि देव को देवताओं को हवि पहुँचाने का कार्य प्रदान किया तथा स्वयं पुत्र रूप में अग्नि का वरण करते हैं. इस प्रकार अंगिरस ऋषि को अग्नि रूप में पुत्र बृहस्पति की प्राप्ति होती है.

ज्ञान, शील और धर्म के अवतार बृहस्पति जी के संदर्भ में एक अन्य कथा है इसके अनुसार ऋषि अंगिरा की पत्नि को मृतवत्सा होने का दोष मिला होता है जिस कारण उनकी संतानें पैदा होते ही मर जाती थी. तब ब्रह्मा जी ने उन्हें पुंसवन व्रत करने को कहते हैं जिसके द्वारा वह इस दोष से मुक्ति प्राप्त कर सकती थी. सुनीमा ने पुत्र प्राप्ति हेतु सनतकुमारों से व्रत विधि को जाना और उनके द्वारा कहे गए विधि विधान से व्रतों को निष्ठा व आस्था के साथ संपूर्ण किया और भगवान विष्णु की कृपा से उन्हें पुत्र रूप में बृहस्पति जी की प्राप्ति हुई.

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