ज्योतिष शास्त्र में दिए गए नव ग्रहों में से एक ग्रह मंगल है. मंगल देव उग्र, ओज युक्त तेज से पूर्ण ग्रह है. मंगल देव को संस्कृत में अंगारक भी कहते हैं. मंगल देव लाल रंग लिए हुए हैं इन्हें भौम अर्थात 'भूमि का पुत्र' कहा जाता है. यह युद्ध के देवता हैं और ब्रह्मचारी हैं. मंगल भगवान को पृथ्वी की संतान माना गया है. यह वृश्चिक और मेष राशि के स्वामी हैं. इनकी प्रकृति तमस गुण वाली मानी गई है. अपने में अद्वितीय तेज से मंगल देव सभी को प्रभावित करते से दिखाई देते हैं. मंगल देव ऊर्जावान कार्रवाई, आत्मविश्वास तथा अहंकार का प्रतिनिधित्व करते हैं.
मंगल भगवान का स्वरूप | The Form of Mars
मंगल भगवान का स्थान नव ग्रहों में आता है यह कुज नाम से भी जाने जाते हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार मंगल ग्रह शक्ति, वीरता और साहस के परिचायक है तथा धर्म रक्षक माने जाते हैं. मंगल देव को चार हाथ वाले, त्रिशूल और गदा धारण किए दर्शाया गया है. भगवान मंगल की पूजा से मंगल शांति प्राप्त होती है तथा कर्ज से मुक्ति धन लाभ प्राप्त होता है .मंगल के रत्न रूप में मूंगा धारण किया जाता मंगल देव दक्षिण दिशा के संरक्षक माने जाते हैं. इनका वाहन एक मेढा़ (भेड़ा) है तथा यह मंगल-वार के स्वामी हैं.
मंगल भगवान जन्म कथा | Birth Story of Mars
मत्स्य पुराण तथा स्कंध पुराण आदि में मंगल देव के विषय में विस्तार पूर्वक उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार उज्जैन में ही मंगल भगवान की उत्पत्ति हुई थी. मंगल देव के जन्म की कथा के बारे में पुराणों उल्लेख मिलता है. जिसके अनुसार अंधकासुर नामक एक राक्षस था उसने भगवान शिव की उपासना की तथा वर्षों तक उनकी तपस्या में लीन रहा. भगवान शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद प्रदान करते हैं. अंधकासुर भगवान से वरदान मांगता है कि मेरी रक्त बूंदे जहां भी गिरे वहीं पर मैं फिर से जन्म लेता रहूँ.
इस पर भगवान उसे यही वरदान प्रदान करते हैं इस वरदान को पाकर दैत्य अंधकासुर चारों ओर तबाही फैला देता है. शिव के वरदान स्वरूप कोई भी उसे हरा नहीँ पाता जिस कारण सभी लोग प्रभु से पार्थना करते हैं की वो उन्हें इस संकट से आन उबारें. तब भगवान शिव अंधकासुर से युद्ध करते हैं इस बीच भयंकर युद्ध होता है दोनों के बीच भीषण युद्ध होता है. भगवान शिव जितनी बार भी अपने त्रिशूल से उसे मारते हैं वह अगले ही पुन: जीवित हो जाता है. उसका रक्त गिरते ही अनेक अंधकासुर उत्पन्न हो जाते हैं. इस लम्बे युद्ध को करते करते भगवान शिव थक जाते हैं और उनके शरीर से पसीने की कुछ बूंदें उज्जैन की भूमि पर गिरती हैं और उन बूँदों के गिरने से पृथ्वी दो भागों में बंट जाती है जिसमें से मंगल देव का जन्म होता है. और इस बीच दैत्य का सारा रक्त मंगल में समा जाता है जिससे उसका अंत होता है.
अन्य कथा | Other Story
वाराह कल्प समय जब हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को जबरन अपने पास रख लिया तब पृथ्वी के उद्धार के लिये भगवान विष्णु ने वराहावतार लिया और दैत्य हिरण्याक्ष को मारकर पृथ्वी को मुक्त किया. भगवान को देखकर पृथ्वी देवी अत्यन्त प्रसन्न हुईं और उनके मन में भगवान को पति रूप में पाने की इच्छा हुई. पृथ्वी की इच्छा पूर्ण करने हेतु भगवान ने देवी पृथ्वी के साथ कुछ समय व्यतीत किया. इस प्रकार पृथ्वी देवी और भगवान के मिलन से मंगल ग्रह की उत्पत्ति हुई. ऐसे विभिन्न कल्पों में मंगल ग्रह की उत्पत्ति की विभिन्न कथाएँ हैं मौजूद हैं.
मंगल की शांति के उपाय | Remedies for Mars
मंगल ग्रह की शांति के लिये भगवान शिव की पूजा करें. मंगलवार का व्रत करें तथा हनुमान चालीसा का पाठ करें. मंगल के लिए दान में ताँबा, सोना, गेहूँ, लाल वस्त्र, गुड़, केसर, लाल चन्दन, लाल पुष्प, मसूर की दाल इत्यादि वस्तुओं को दिया जा सकता है. मंगल की महादशा सात वर्षों तक रहती है. यह मेष तथा वृश्चिक राशि के स्वामी हैं और इनका रत्न मूँगा है.
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