कार्तिक स्नान 2011| Kartik Snan | Kartik Snan 2011 | Significance of Kartik Month

 

प्रतिवर्ष कार्तिक माह आरम्भ होते ही पवित्र स्नान का भी शुभारम्भ हो जाता है. इस माह तड़के उठकर महिलाएं तथा पुरुष पवित्र स्नान के लिए जाते हैं. कार्तिक माह में कार्तिक पूर्णिमा का महत्व और भी अधिक माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार भी कार्तिक माह की पूर्णिमा को लिया था. इस दिन गंगा स्नान, दीपदान आदि का बहुत महत्व है. इसके अतिरिक्त व्यक्ति अपनी क्षमतानुसार भी दानादि कर सकता है.

इस दिन दान का बहुत महत्व माना गया है. त्रिदेवों ने इस दिन को महापुनीत पर्व कहा है. इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहा जाता है. कार्तिक पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा कृत्तिका नक्षत्र में स्थित हो और सूर्य विशाखा नक्षत्र में स्थित हो तब "पद्म योग" बनता है. इस योग अपना विशेष महत्व है.

कार्तिक पूर्णिमा पूजा विधि | Kartik Purnima Puja Vidhi

इस दिन सुबह स्नान आदि से निवृत होकर पूरा दिन निराहार रहते हैं और भगवान विष्णु की आराधना करते हैं. श्रद्धालुगण इस दिन गंगा स्नान के लिए भी जाते हैं. जो गंगा स्नान के लिए नहीं जा पाते वह अपने नगर की ही नदी में स्नान करते हैं. भगवान का भजन करते हैं. संध्या समय में मंदिरों, चौराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाते हैं. लम्बे बाँस में लालटेन बाँधकर किसी ऊंवे स्थान में "आकाशी" प्रकाशित करते हैं. इस व्रत को करने में स्त्रियों की संख्या अधिक होती है.

इस दिन कार्तिक पूर्णिमा का व्रत करने वाले व्यक्ति को ब्राह्मण को भोजन अवश्य कराना चाहिए. भोजन से पूर्व हवन कराएं. संध्या समय में दीपक जलाना चाहिए. अपनी क्षमतानुसार ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देनी चाहिए. कार्तिक पूर्णिमा के दिन रात्रि में चन्द्रमा के दर्शन करने पर शिवा, प्रीति, संभूति, अनुसूया, क्षमा तथा सन्तति इन छहों कृत्तिकाओं का पूजन करना चाहिए. पूजन तथा व्रत के उपरान्त वृष(बैल) दान से व्यक्ति को शिवलोक प्राप्त होता है. जो लोग इस दिन गंगा तथा अन्य पवित्र स्थानों पर श्रद्धा - भक्ति से स्नान करते हैं, वह भाग्यशाली होते हैं.

लपसी - तपसी की कहानी | Story of Lapsi Tapsi 

प्राचीन समय की बात है. एक नगर में दो व्यक्ति रहते थे. एक नाम लपसी था और दूसरे का नाम तपसी था. तपसी भगवान की तपस्या में लीन रहता था. लेकिन लपसी सवा सेर की लस्सी बनाकर भगवान का भोग लगाता और लोटा हिलाकर जीम स्वयं जीम लेता था. एक दिन दोनों स्वयं को एक-दूसरे से बडा़ मानने के लिए लड़ने लगे. लपसी बोला कि मैं बडा़ हूं और तपसी बोला कि मैं बडा़ हूँ. तभी वहाँ नारद जी आए और पूछने लगे कि तुम दोनों क्यूं लड़ रहे हो? तब लपसी कहता है कि मैं बडा़ हूं और तपसी कहता है कि मैं बडा़ हूँ. दोनों की बात सुनकर नारद जी ने कहा कि मैं तुम्हारा फैसला कर दूंगा.

अगले दिन तपसी नहाकर जब वापिस आ रहा था, तब नारद जी ने उसके सामने सवा करोड़ की अंगूठी फेंक दी. तपसी ने वह अंगूठी अपने नीचे दबा ली और तपस्या करने बैठ गया. लपसी सुबह उठा, फिर नहाया और सवा सेर लस्सी बनाकर भगवान का भोग लगाकर जीमने लगा. तभी नारद जी आते हैं और दोनों को बिठाते हैं. तब दोनों पूछते है कि कौन बडा़ है? तपसी बोला कि मैं बडा़ हूँ. नारद जी बोले - तुम गोडा़ उठाओ और जब गोडा़ उठाया तो सवा करोड़ की अंगूठी निकलती है. नारद जी कहते हैं कि यह अंगूठी तुमने चुराई है. इसलिए तेरी तपस्या भंग हो गई है और लपसी बडा़ है.

सभी बातें सुनने के बाद तपसी नारद जी से बोला कि मेरी तपस्या का फल कैसे मिलेगा? तब नारद जी उसे कहते हैं - तुम्हारी तपस्या का फल कार्तिक माह में पवित्र स्नान करने वाले देगें.उसके आगे नरद जी कहते हैं कि सारी कहानी कहने के बाद जो तेरी कहानी नहीं सुनाएगा या सुनेगा, उसका कार्तिक का फल खत्म हो जाएगा.

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