
करक चतुर्दशी व्रत कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन मनाया जाता है. करक चतुर्दशी को करवा चौथ के नाम से भी जाना जाता है. करक चतुर्दशी का यह पवित्र पर्व सौभाग्यवती(सुहागिन) स्त्रियाँ मनाती हैं. पति की दीर्घायु एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस दिन चंद्रमा की पूजा की जाती है. इसी के साथ देवी गौरी भगवान शिव एवं गणेश जी की पूजा अर्चना की जाती है. करवाचौथ के दिन उपवास रखकर रात्रि समय चन्द्रमा को अर्घ्य देने के उपरांत ही भोजन करने का विधान है. करक चतुर्दशी या करवा चौथ मुख्यत: भारत के अनेक विभिन्न भागों में उत्साह के साथ मनाया जाता है. इस वर्ष करक चतुर्दशी या करवाचौथ 2 नवम्बर दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा.
करक चतुर्थी कथा | Karak Chaturthi Story
करक चतुर्दशी के संदर्भ में एक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार, करवा नाम की एक स्त्री थी वह बहुत पतिव्रता थी. वह अपने पति के साथ तुंगभद्रा नदी के पास एक गाँव में रहती थी. एक बार करवा का पति नदी के किनारे कपड़े धो रहा था होता है. तभी अचानक वहां एक मगरमच्छ आता है और वह उसके पति का पाँव अपने मुँह में दबा लेता है तथा उसे नदी में खींचकर ले जाने लगता है. तब उसका पति जोर जोर से अपनी पत्नि को करवा, करवा, करवा कह के मदद के लिए पुकारने लगता है. पति की आवाज़ सुन कर करवा भागी भागी वहां पहुंची है.
पति को मगर के चंगुल में फंसा देख मगर को कच्चे धागे से बाँध देती है व यमराज से पति के जीवन की रक्षा करने को कहती है. करवा की कुरूण व्यथा देख कर यमराज उनसे कहते हैं की वह मगर को मृत्यु नहीं दे सकते क्योंकि उसकी आयु शेष है, परंतु करवा के पति-धर्म को देख यमराज मगरमच्छ को यमपुरी भेज देते हैं. करवा के पति को दीर्घायु प्राप्त होती है तथा यमराज करवा को प्रसन्न हो उसे वरदान देते हैं. कि जो भी स्त्री कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को व्रत का पालन करेगी वह सौभाग्यवती होगी. तब से करवा-चौथ व्रत को मनाने की परंपरा चली आ रही है.
धर्म ग्रंथों में एक महाभारत से संबंधित अन्य पौराणिक कथा का भी उल्लेख किया गया है. इसके अनुसार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले जाते हैं व दूसरी ओर पांडवों पर कई प्रकार के संकटों से आन पड़ते हैं. यह सब देख द्रौपदी चिंता में पड़ जाती है वह भगवान श्री श्रीकृष्ण से इन सभी समस्याओं से मुक्त होने का उपाय पूछती हैं
श्री कृष्ण द्रौपदी से कहते हैं कि यदि वह कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवा चौथ का व्रत रहे तो उसे इन सभी संकटों से मुक्ति मिल सकती है. भगवान कृष्ण के कथन अनुसार द्रौपदी विधि विधान सहित करवा चौथ का व्रत रखती हैं जिससे उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं
करक चतुर्थी । करवा चौथ पूजा | Karva Chauth Puja
कार्तिक माह कि कृष्ण चन्द्रोदयव्यापिनी चतुर्थी के दिन किया जाने वाला करक चतुर्थी व्रत स्त्रियां अखंड़ सौभाग्य की कामना के लिए करती हैं. इस व्रत में शिव-पार्वती, गणेश और चन्द्रमा का पूजन किया जाता है. इस शुभ दिवस के उपलक्ष्य पर सुहागिन स्त्रियां पति की लंबी आयु की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. पति-पत्नी के आत्मिक रिश्ते और अटूट बंधन का प्रतीक यह करवाचौथ या करक चतुर्थी व्रत संबंधों में नई ताज़गी एवं मिठास लाता है. करवा चौथ में सरगी का काफी महत्व है. सरगी सास की तरफ से अपनी बहू को दि जाने वाली आशीर्वाद रूपी अमूल्य भेंट होती है
सरगी के रूप में सास अपनी बहू को विभिन्न खाद्य पदार्थ एवं वस्त्र इत्यादि देती हैं. यह सरगी, सौभाग्य और समृद्धि का रूप होती है. सरगी के रूप में खाने की वस्तुओं को जैसे फल, मीठाई आदि को व्रती महिलाएं व्रत वाले दिन सूर्योदय से पूर्व प्रात: काल में तारों की छांव में ग्रहण करती हैं. तत्पश्चात व्रत आरंभ होता है. इस दिन स्त्रियां साज, श्रृंगार करती हैं हाथों में मेंहदी रचाती हैं और पूजा के समय नए वस्त्र पहनती हैं
शाम को कथा सुनने के बाद अपनी सासु माँ के पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं और उन्हें करवा समेत अनेक उपहार भेंट करती हैं. रात्रि समय चांद निकलने के पश्चात अनेक पकवानों से करवा चौथ की पूजा की जाती है तथा चांद को अर्ध्य देकर उसकी पूजा करते हैं. चंद्र दर्शन के बाद पति का चेहरा देखकर पत्नी, पति के हाथों से जल पीती हैं और अपने व्रत को पूर्ण करती हैं.
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