दत्तात्रेय जयन्ती | Dattatreya Jayanti | Dattatreya Jayanti Festival

दत्तात्रेय जयन्ती प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष माह की कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को मनाई जाती है. दत्तात्रेय के संबंध में प्रचलित है कि इनके तीन सिर हैं और छ: भुजाएँ हैं. इनके भीतर ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश तीनों का ही संयुक्त रुप से अंश मौजूद है. इस दिन दत्तात्रेय जी के बालरुप की पूजा की जाती है.

दत्तात्रेय जी के संबंध में कथा | Story of Dattatreya

प्राचीन ग्रंथों के अनुसार एक बार तीनों देवियों पार्वती, लक्ष्मी तथा सावित्री जी को अपने पतिव्रत धर्म पर बहुत घमण्ड होने लगा. नारद जी को जब इनके घमण्ड के बारे में पता चला तो वह इनका घमण्ड चूर करने के लिए बारी-बारी से तीनों देवियों के पास पहुंचें. सर्वप्रथम नारद जी पार्वती जी के पास पहुंचे और अत्रि ऋषि की पत्नी देवी अनुसूया के पतिव्रत धर्म का गुणगान करने लगे. देवी ईर्ष्या से भर उठी और नारद जी के जाने के पश्चात भगवान शंकर से अनुसूया का सतीत्व भंग करने की जिद करने लगी.

उसके बाद नारद जी लक्ष्मी जी के पास गए और लक्ष्मी जी के समक्ष भी देवी अनुसूया के सतीत्व की बात आरम्भ करके उनकी प्रशंसा करने लगे. लक्ष्मी जी को भी उनकी तारीफ सुनना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा. नारद जी के जाने के बाद वह भी विष्णु जी से अनुसूया देवी का सतीत्व भंग करने की जिद पकड़कर बैठ गई.

विष्णुलोक से नारद जी सीधे ब्रह्मलोक जा पहुंचे और देवी सावित्री के सामने देवी अनुसूया की प्रशंसा का राग अलापने लगे. देवी सावित्री को उनकी प्रशंसा सुनना कतई भी रास नहीं आया. घमण्ड के कारण वह जलने-भुनने लगी. नारद जी के चले जाने के बाद वह भी देवी अनुसूया के पतिव्रत धर्म को भंग करने की बात ब्रह्मा जी से करने लगी.

ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश तीनों को अपनी पत्नियो के सामने हार माननी पडी़ और वह तीनों ही देवी अनुसूया की कुटिया के सामने एक साथ भिखारी के वेश में जाकर खडे़ हो गए. तीनों का एक ही मकसद होने से अनुसूया के द्वार पर एक साथ ही समागम हुआ. जब देवी अनुसूया इन्हें भिक्षा देने लगी तब इन्होंने भिक्षा लेने से मना कर दिया और भोजन करने की ईच्छा प्रकट की.

देवी अनुसूया ने अतिथि सत्कार को अपना धर्म मानते हुए उनकी बात मान ली और उन्हें स्नान करने के लिए बोलकर स्वयं भोजन की तैयारी में लग गई. तीनों देव जब नहाकर आए तब अनुसूया श्रद्धा तथा प्रेम भाव से भोजन की थाली परोस लाई. लेकिन तीनों देवों ने भोजन करने से इन्कार करते हुए कहा कि जब तक आप नग्न होकर भोजन नहीं परोसेगी तब तक हम भोजन नहीं करेगें. देवी अनुसूया यह सुनते ही पहले तो स्तब्ध रह गई और गुस्से से भर उठी. लेकिन अपने पतिव्रत धर्म के बल पर उन्होंने तीनो की मंशा जान ली.

उसके बाद देवी ने ऋषि अत्रि के चरणों का जल तीनों देवों पर छिड़क दिया. जल छिड़कते ही तीनों ने बालरुप धारण कर लिया. बालरुप में तीनों को भरपेट भोजन कराया. देवी अनुसूया उन्हें पालने में लिटाकर अपने प्रेम तथा वात्सल्य से उन्हें पालने लगी. धीरे-धीरे दिन बीतने लगे. जब काफी दिन बीतने पर भी ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश घर नही लौटे तब तीनों देवियों को अपने पतियों की चिन्ता सताने लगी.

एक दिन उन तीनों को नारद जी से पता चला कि यह तीनों देव माता अनुसूया के घर की ओर गए थे. यह सुनते ही तीनों देवियाँ अत्रि ऋषि के आश्रम में पहुंची और माता अनुसूया से अपने-अपने पति के विषय में पूछने लगी. अनुसूया माता ने पालने की ओर इशारा करते हुए कहा कि यह रहे तुम्हारे पति! अपने-अपने पतियों को पहचानकर उन्हें अपने साथ ले जाओ. लक्ष्मी जी ने चतुरता दिखाते हुए विष्णु जी को पहचानकर उठाया लेकिन वह भगवान शंकर निकले. इस पर सभी उनका उपहास करने लगे.

तीनों देवियों को अपनी भूल पर पछतावा होने लगा. वह तीनों ही माता अनुसूया से क्षमा मांगने लगी. तीनों ने उनके पतिव्रत धर्म के समक्ष अपना सिर झुकाया. माता अनुसूया ने कहा कि इन तीनों ने मेरा दूध पीया है, इसलिए इन्हें बालरुप में ही रहना ही होगा. यह सुनकर तीनों देवों ने अपने - अपने अंश को मिलाकर एक नया अंश पैदा किया. इसका नाम दत्तात्रेय रखा गया. इनके तीन सिर तथा छ: हाथ बने. तीनों देवों को एकसाथ बालरुप में दत्तात्रेय के अंश में पाने के बाद माता अनुसूया ने अपने पति अत्रि ऋषि के चरणों का जल तीनों देवो पर छिड़का और उन्हें पूर्ववत रुप प्रदान कर दिया.


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