भीष्म पंचक | Bhishma Panchaka | Punch Bhiku

भीष्म पंचक को पंच भीखू के नाम से भी जाना जाता है. कार्तिक माह में भीष्म पंचक व्रत का विशेष महत्व है. यह व्रत कार्तिक शुक्ल एकादशी से आरंभ होता है तथा पूर्णिमा तक चलता है. इस बार 6 नवंबर से भीष्म पंचक व्रत का आरंभ होगा और दस नवंबर पूर्णिमा तक यह व्रत रहेगा. कार्तिक स्नान का बहुत महत्व होता है. अत: कार्तिक सनान करने वाले सभी लोग इस व्रत को करते हैं. भीष्म पितामह जी ने भी इस व्रत को किया था इसलिए यह भीष्म पंचक नाम से प्रसिद्ध हुआ

भीष्म पंचक व्रत कथा | Bhishma Panchak Vrat Katha

महाभारत युद्ध के बाद जब पांण्डवों की जीत हो गयी तब श्री कृष्ण भगवान पांण्डवों को भीष्म पितामह के पास ले गये और उनसे अनुरोध किया कि वह पांण्डवों को ज्ञान प्रदान करें. शर सैय्या पर लेटे हुए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतिक्षा कर रहे भीष्म ने  कृष्ण के अनुरोध पर कृष्ण सहित पाण्डवों को  राज धर्म, वर्ण धर्म एवं मोक्ष धर्म का ज्ञान दिया. भीष्म द्वारा ज्ञान देने का क्रम एकादशी से लेकर पूर्णिमा तिथि यानि पांच दिनों तक चलता रहा. भीष्म ने जब पूरा ज्ञान दे दिया तब श्री कृष्ण ने कहा कि आपने जो पांच दिनों में ज्ञान दिया है यह पांच दिन आज से अति मंगलकारी हो गया है. इन पांच दिनों को भविष्य में भीष्म पंचक व्रत के नाम से जाना जाएगा.

भीष्म पंचक व्रत पूजा विधि | Bhishma Panchak Vrat Pooja Vidhi

भीष्म पंचम व्रत में चार द्वार वाला एक मण्डप बनाया जाता है. मंडप को गाय को गोबर से लीप कर मध्य में एक वेदी का निर्माण किया जाता है. वेदी पर तिल रखकर कलश स्थापित किया जाता है. इसके बाद भगवान वासुदेव की पूजा की जाती है. इस व्रत में कार्तिक शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तिथि तक घी के दीपक जलाए जाते हैं. भीष्म पंचक व्रत करने वाले को पांच दिनों तक संयम एवं सात्विकता का पालन करते हुए यज्ञादि कर्म करना चाहिए.  इस व्रत में गंगा पुत्र भीष्म की तृप्ति के लिए श्राद्ध और तर्पण का भी विधान है.

पंच भीखू कथा | Punch Bhiku Story

पंच भीखू व्रत में एक कथा का भी उल्लेख आता है. इस कथा के अनुसार एक नगर में एक साहूकार था. इस साहूकार की पुत्रवधु बहुत ही संस्कारी थी. वह कार्तिक माह में बहुत ही पूजा-पाठ किया करती थी. कार्तिक माह में वह ब्रह्म मुहुर्त में ही गंगा स्नान के लिए जाती थी. जिस नगर में वह रहती थी, उस नगर के राजा का बेटा भी गंगा स्नान के लिए जाता था. उसके अंदर बहुत अहंकार भरा था. वह कहता कि कोई भी व्यक्ति उससे पहले गंगा स्नान नहीं कर सकता है.

जब कार्तिक स्नान के पांच दिन रहते हैं तब साहूकार की पुत्रवधु स्नान के लिए जाती है. वह जल्दबाजी में हार भूल जाती है और वह हार राजा के लड़के को मिलता है. हार देखकर वह उस स्त्री को पाना चाहता है. इसके विषय में यह कहा गया है कि वह तोता रखता ताकि वह उसे बता सके कि साहूकार की पुत्रवधू आई है. लेकिन साहूकार की पुत्रवधु भगवान से अपने पतिव्रता धर्म की रक्षा करने की प्रार्थना करती है.

भगवान उसकी रक्षा करते हैं और रोज रात में साहूकार के बेटे को नींद आ जाती है. जब सुबह तोते से पूछता है तब वह कहता है कि वह स्नान करने आई थी. पांच दिन स्नान करने बाद वह तोते से कहती है कि मैं पांच दिन तक स्नान कर चुकी हूं तुम अपने स्वामी से मेरा हार लौटाने को कह देना. राजा के पुत्र को समझ आया कि वह कितनी श्रद्धालु है. कुछ समय बाद उसे कोढ़ हो जाता है.

राजा को जब कोढ़ होने का कारण पता चलता हे तब वह इसके निवारण का उपाय ब्राह्मणों से पूछता है.  ब्राह्मण कहते हैं कि यह साहूकार की पुत्रवधु को अपनी बहन बनाए और उसके नहाए हुए पानी से स्नान करे तब यह ठीक हो सकता है. राजा की प्रार्थना को साहूकार की पुत्रवधु स्वीकार कर लेती है और राजा का पुत्र ठीक हो जाता है.

पंच भीखू व्रत महत्व | Importance of Punch Bhiku Vrat

यह व्रत अति मंगलकारी और पुण्यदायी होता है. जो श्रद्धापूर्वक इस व्रत को रखेंगे उन्हें मृत्य पश्चात उत्तम गति प्राप्त होगी. यह व्रत पूर्व संचित पाप कर्मों से मुक्ति प्रदान करने वाला और कल्याणकारीहोता है. जो भी यह व्रत रखता है वह सदैव स्वस्थ रहता है तथा उसे प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त होता है. स्वयं भीष्म पितामह जी ने भी इस व्रत को किया था

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