भैरवाष्टमी । कालाष्टमी । Bhairava Ashtami | Kala Bhairav Ashtami 2011

 

मार्गशीर्ष कृष्ष्ण पक्ष अष्टमी के शुभ दिन भगवान शिव, भैरव रूप में प्रकट हुए थे. कालाष्टमी का व्रत इसी उपलक्ष्य में इस तिथि को किया जाता है . 18 नवंबर 2011 दिन शुक्रवार को भैरव अष्टमी मनाई जाएगी. भैरवाष्टमी को कालाष्टमी के नाम से भी मनाते हैं. भगवान भोले नाथ के इस भैरव रूप के स्मरण मात्र से ही सभी प्रकार के पाप, ताप एवं कष्ट दूर हो जाते हैं. भैरव जी की पूजा उपासना मनोवांछित फल देने वाली होती है. अत:  भैरव जी की पूजा अर्चना करने तथा भैरवाष्टमी के दिन व्रत एवं षोड्षोपचार पूजन करना अत्यंत शुभ एवं फलदायक माना जाता है. शास्त्रों के अनुसार इस दिन श्री कालभैरव जी का दर्शन एवं पूजन मनवांछित फल देने वाला होता है. 

भगवान भैरवनाथ जी तंत्र-मंत्र की विद्याओं के ज्ञाता हैं , साक्षात रुद्र हैं. शिवपुराण में भैरव को भगवान शंकर का रूप कहा गया है. यही सृष्टि की रचना, पालन और संहारक हैं. इनका आश्रय प्राप्त करके भक्त निर्भय हो जाता है तथा सभी कष्टों से मुक्त रहता है. भैरवनाथ अपने भक्तों की सदैव रक्षा करते हैं. 

भैरवाष्टमी कथा । Bhairav Ashtmi Katha

भैरवाष्टमी पर पौराणिक आख्यान मौजूद हैं इनके अनुसार एक बार श्री हरि विष्णु और ब्रह्मा जी के मध्य  विवाद उत्पन्न हो जाता है कि उनमें से श्रेष्ठ कौन है. यह विवाद इस हद तक बढ़ गया कि भगवान शिव एक सभा का आयोजन करते हैं. इस सभा में महत्वपूर्ण ज्ञानी, ऋषि-मुनि, सिद्ध संत, उपस्थित होते हैं. इस सभा में एक निर्णय लिया जाता है जिसे भगवान श्री विष्णु तो स्वीकार कर लेते हैं किंतु भगवान ब्रह्मा जी इस निर्णय से संतुष्ट नहीं होते तथा महादेव का अपमान करने लगते हैं. शांत चित के भगवान शिव यह अपमान सहन न कर सके 

और ब्रह्मा द्वारा अपमानित किये जाने पर भगवान शिव ने रौद्र रुप धारण कर लिया. भगवान शंकर प्रलय के रूप में नज़र आने लगे और उनका रौद्र रुप देखकर तीनो लोक भयभीत हो गए. भगवान शिव के इसी रूद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट हुए. भगवान भैरव (God Bhairav) श्वान पर सवार थे, इनके हाथ में दंड था हाथ में दण्ड होने के कारण यह दण्डाधिपति भी कहे जाते हैं. भैरव जी का रूप अत्यंत भयंकर था. भैरव जी के इस रूप को देखकर ब्रह्मा जी को अपनी ग़लती का एहसास होता है. वह भगवान भोले नाथ एवं भैरव की वंदना करने लगते हैं. भगवान भैरव ब्रह्मा जी एवं अन्य देव और संत-साधुओं द्वारा वंदना करने पर शांत होते हैं. इस तरह भैरव जी की उत्पत्ति होती है. 

भैरवाष्टमी व्रत पूजा विधि । Bhairava Ashtami Pooja Vidhi

शिव के भैरव रूप की उपासना करने वाले भक्तों को भैरव नाथ (BHairo Nath) जी की षोड्षोपचार सहित पूजा करनी चाहिए व उन्हें आर्घ्य देना चाहिए. रात के समय जागरण करके भोले शंकर एवं माता पार्वती जी की कथा एवं भजन कीर्तन करना चाहिए तथा भैरव जी कथा का श्रवण- मनन करना चाहिए. मध्य रात्रि होने पर शंख, नगाड़ा, घंटा आदि बजाकर भैरव जी की आरती करनी चाहिए.

भगवान भैरव नाथ (Bhairo Nath) का वाहन श्वान अर्थात कुत्ता है. भैरव जी की प्रसन्नता हेतु इस दिन कुत्ते को भोजन दें. मान्यता अनुसार इस दिन प्रात: काल पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करके पितरों का श्राद्ध व तर्पण करके भैरव जी की पूजा व व्रत करने से समस्त विघ्न समाप्त हो जाते हैं तथा दीर्घायु  प्राप्त होती है. भैरव जी की पूजा व भक्ति करने से भूत, पिशाच एवं काल भी दूर दूर रहते हैं. व्यक्ति को कोई रोग दोष स्पर्श नहीं कर पाते हैं. शुद्ध मन एवं आचरण से ये जो भी कार्य करते हैं उनमें इन्हें सफलता मिलती है.

भैरवाष्टमी महत्व | Significance Of Bhairava Ashtami

काल भैरव के साथ साथ  इस दिन देवी कालिका जी की पुजा अर्चना एवं व्रत का भी विधान है. देवी काली की उपासना करने वालों को अर्ध रात्रि के बाद मां की उसी प्रकार से पूजा करनी चाहिए जिस प्रकार दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि को देवी कालरात्रि की पूजा का विधान है. 

भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है. भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अनेक समस्याओं का निदान होता है.  कालभैरव अष्टमी पर भैरव के दर्शन करने से आपको अशुभ कर्मों से मुक्ति मिल सकती है. भैरव उपासना क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त करती है. 

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