कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई अष्टमी के रूप में मनाते हैं. अहोई अष्टमी का व्रत महिलायें अपनी सन्तान की रक्षा और उसकी लंबी उम्र की कामना के लिए रखती हैं. इस वर्ष 2012 को अहोई अष्टमी 7 नवम्बर बुधवार के दिन मनाई जाएगी परंतु कुछ व्यक्ति जिस वार की दीवाली पड़ती है उससे ठीक आठ दिन पहले वाले वार या दिन को अहोई अष्टमी का व्रत रखते हैं. जैसे इस वर्ष दीवाली 13 नवम्बर मंगलवार के दिन है, इसलिए उससे आठ दिन पहले 6 मंगलवार के दिन अहोई का व्रत रखेंगे.
अहोई अष्टमी व्रत कथा | Ahoi Ashtami Vrat Katha
प्राचीन काल में एक साहूकार रहा करता था. साहूकार की पत्नि चंद्रिका बहुत गुणवती थी. उसकी बहुत संताने थी वह अपने परिवार के साथ सुख से जीवन यापन कर रहा होता हैं. एक बार साहूकार की स्त्री घर की लीपा-पोती हेतु मिट्टी लेने खदान में जाती है और कुदाल से मिट्टी खोदने लगती है, परंतु उसी जगह एक सेह की मांद होती है और अचानक उस स्त्री के हाथ से कुदाल सेह के बच्चे को लग जाती है जिससे सेह का बच्चे की मृत्यु हो जाती है
इस घटना से साहूकार की पत्नी को बहुत दुख होता है मन में पश्चाताप का भाव लिए वह घर लौट जाती है. परंतु कुछ दिनों उसकी संताने एक एक करके मरने लगती हैं, अपने बच्चों की अकाल मृत्यु से पति पत्नि दुखी रहने लगते हैं. बच्चों की शोक सभा में जब साहूकारकी पत्नी विलाप करती हुई उन्हें बताती है कि उसने जान-बूझ कर कभी कोई पाप नहीं किया लेकिन एक बार अंजाने में उससे एक सेह के बच्चे की हत्या हो गई थी.
यह सुनकर औरतें साहूकार की पत्नी को दिलासा देती हैं और उसे अष्टमी माता की पूजा करने को कहती हैं. साहूकार की पत्नी सेह और सेह के बच्चों का चित्र बनाकर अहोई माता की पूजा करती है और माँ से अपने अपराध की क्षमा-याचना करती है. तब माँ प्रसन्न हो उसकी होने वाली संतानों को दीर्घ आयु का वरदान देती हैं तभी से अहोई व्रत की परंपरा प्रचलित हो गई.
एक अन्य कथा अनुसार, प्राचीन काल में दतिया नगर में चंद्रभान नाम का एक साहूकार रहता था. उसकी बहुत सी संताने थी, परंतु उसकी संताने अल्प आयु में ही अकाल मृत्यु को प्राप्त होने लगती हैं. अपने बच्चों की अकाल मृत्यु से पति पत्नी दुखी रहने लगते हैं. कोई संतान न होने के कारण वह पति पत्नी अपनी धन दौलत का त्याग करके वन की ओर चले जाते हैं और बद्रिकाश्रम के समीप बने जल के कुंड के पास पहुँचते हैं तथा वहीं अपने प्राणों का त्याग करने के लिए अन्न जल का त्याग करके बैठ जाते हैं.
इस तरह छह दिन बीत जाते हैं तब सातवें दिन एक आकाशवाणी होती है कि, हे साहूकार तुम्हें यह दुख तुम्हारे पूर्व जन्म के पाप से मिल रह है अत: इन पापों से मुक्ति के लिए तुम्हें अहोई अष्टमी के दिन व्रत का पालन करके अहोई माता की पूजा अर्चना करना जिससे प्रसन्न हो अहोई मां तुम्हें पुत्र की दीर्घ आयु का वरदान देंगी. इस प्रकार दोनो पति पत्नी अहोई अष्टमी के दिन व्रत करते हैं और अपने पापों की क्षमा मांगते हैं. अहोई माँ प्रसन्न हो उन्हें संतान की दीर्घायु का वरदान देतीं हैं.
अहोई अष्टमी पूजा | Ahoi Ashtami Puja
अहोई अष्टमी के दिन पूजा पाठ करके अपनी संतान की दीर्घायु एवं सुखमय जीवन हेतु कामना करते हुए व्रत करना चाहिए.
अहोई माता की पूजा के लिए गेरू से दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाते हैं तथा साथ ही सेह और उसके बच्चों का चित्र भी बनाते हैं. सन्ध्या समय माँ का पूजन करने के उपरांत अहोई माता की कथा सुनते हैं. पूजा के बाद सास के पैर छू कर आर्शीवाद प्राप्त कर तारों की पूजा करके जल चढ़ाते हैं. इसके पश्चात व्रती जल ग्रहण करके व्रत का समापन करता है
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